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Friday, August 9, 2013


जल, जल रहा है (burning of water)
                                                        :-  परमजीत सिहँ 
भूल गये हैं अपनों को,
जाने कौन हमें छल रहा है,
चिंता का यह विषय है,
कि अपनी संस्कृति का मह्त्तव गल रहा है,
लगता है मुझे ऐसे,
जैसे कि जल, जल रहा है
सच्चा ज्ञान कोई ले नहीं रहा,
घोर अज्ञान पल रहा है,
सच्चे संगीत से अपरीचित हैं,
विदेशी शोर चल रहा है,
लगता है मुझे ऐसे,
जैसे कि जल, जल रहा है.
मन को सुकून देती आवाज़ नहीं,
अशलीलता का कैसा दौर है,
आज है गाना ,कल रवाना,
क्योंकि, यह दिल माँगे मोर है,
भटके हैं, या भटकाया है,
यही सवाल इस मन में खल रहा है,
लगता है मुझे ऐसे,
जैसे कि जल, जल रहा है.
दिल और रुह से जो जोड़े, उसका सत्कार करो
पहचानों सच्चा संगीत, और उससे प्यार करो
वक़्त है अब भी , संभाल लो!!,
यह वक़्त, हाथों से निकल रहा है,
लगता है मुझे ऐसे, 
जैसे कि जल, जल रहा है.

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