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Friday, August 9, 2013

देश आज़ाद, पर लोग गुलाम !!!

                                                           :-  परमजीत सिहँ
देश आज़ाद, पर लोग गुलाम,
सज़दा-ए-ख़ौफ सरेआम है,
बेबस,धूमिल सच्च पड़ा इक ओर,
झूठ का परचम लहरहाता सुबह-शाम है ।।१।।

शोर हो इतना, कि बस कुछ और न हो,

फ़रेब की ऐसी रात, जिसकी फ़िर भोर न हो,
बिका अख़बार, बिका थानेदार,
शर्मसार इंसानियत का नाम है,
बेबस,धूमिल सच्च पड़ा इक ओर,
झूठ का परचम लहरहाता सुबह-शाम है ।।२।।

गुमराह करो इतना, कि कोई राह न दिखे,

धर्म-जात का सौदा सरे बाज़ार बिके,
बिका पण्डित, बिका मुल्ला,
बड़ा सस्ता यहाँ ईमान है,
बेबस,धूमिल सच्च पड़ा इक ओर,
झूठ का परचम लहरहाता सुबह-शाम है ।।३।।

कला बेपरवाह नहीं, सियासती आग़ोश है

कुचली हर वो आवाज़, जिसमे बू-ए-सरफ़रोश है
बिका कलाकार, बिका पुरुस्कार,
तस्वीरों में अब कहाँ ज़मीर-ओ-जान है,
बेबस,धूमिल सच्च पड़ा इक ओर,
झूठ का परचम लहरहाता सुबह-शाम है ।।४।। 
सोच पर लगी इन बेड़ीयों से, समझ ही आज़ाद कर पायेगी,
धर्म-जात और रूढ़ीवाद वरना यूँ ही देश को खाएगी,
स्वछंद समीर, बहे सच्च का नीर,
फिर रोशन मेरा वतन-ओ-ज़हान है।।५।।
बेबस,धूमिल सच्च पड़ा इक ओर,
झूठ का परचम लहरहाता सुबह-शाम है……

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